बाइबल से सम्बंधित शब्द

  

  

【1】 आत्मिक जन – आत्मा से जन्मा हुआ (John 3:8)
【2】आनंद- स्थायी रूप  से रहने वाली प्रसन्नता
【3】 शांति – हर परिस्थिति में मन में स्थिरता रहना
【4】 धीरज- परीक्षा/परख के समय में विश्वास को लंबे समय तक थामे रखने का गुण
【5】 कृपा – किसी की दीनहीन दशा के प्रति तरस का भाव आना
【6】 विश्वास- आशा की निश्चिचता 
– अनदेखे को मानो देखना
– एक नींव/ गुण जो हमें किसी भी नष्ट होने की संभावना और किसी भी तरह की परेशानी का सामना करने और सहने योग्य बनाता है। 
【7】 सच्चाई – परमेश्वर को पहचानना ( John 1:14,18)
【8】 परमेश्वर का भय- प्रेम के साथ परमेश्वर के वचन को मानना ( Gen. 22:12; John 14:15)
【9】 क्रोध – हमारी मन की इच्छा के अनुसार किसी काम के संपन्न न होने पर उत्पन्न मनोभाव ( Gen. 4:6; Ephi. 4:26)
【10】 अल्पविश्वास – किसी परिस्थिति के कारण मन में परमेश्वर के वचन के प्रति सन्देह होना ( Mat. 14:30,31)
【11】 सन्देह- किसी विपरीत परिस्थिति के कारण मन का अशांत/अस्थिर दशा में आ जाना ( Mat. 21:21; Dan. 5:16)
【12】 अविश्वास – किसी परिस्थति के कारण परमेश्वर के वचन के प्रति मन में उत्पन्न सन्देह पर पूर्ण भरोसा कर लेना ( Mark 6:1-6)
【13】 प्रार्थना – परमेश्वर के सम्मुख मन की बातों को मुंह पर लाना ( Psa. 62:8)
【14】 मूर्तिपूजा – परमेश्वर के स्थान पर किसी अन्य चीज को ले आना ( Exo. 20:3,4)
【15】 नया जन्म – परमेश्वर के वचन के अनुसार पवित्रात्मा के द्वारा शरीरक दशा से आत्मिक दशा में आना ( John 3:6; 1 Peter 1:23)
【16】 न्याय – कामों का प्रतिफल पाना (Rom. 2:6)
【17】 धार्मिकता – परमेश्वर के अनुरूप जीवन (Gen. 6:9)
   – परमेश्वर के साथ सही रूप से चलना/खड़े रहना।
【18】 कलीसिया – संसार से अलग किए गए लोग (John 15:19)
【19】 पाप – परमेश्वर की बात न मानना
【20】 दीनता – परमेश्वर के सम्मुख टूटा हुआ मन ( Psa. 51:17)
    – परमेश्वर की उपस्थिति में स्वयं को शून्य समझना/मानना
【21】 विवेक – सही और गलत की समझ
【22】 जीवन – परमेश्वर का स्वभाव
【23】 अनंत जीवन – पिता और पुत्र को जानना ( John 17:3)
【24】 मनफिराव – मन के स्वभाव में बदलाव की इच्छा
【25】 झूठी शिक्षा – वह शिक्षा/विचारधारा/मत जो परमेश्वर या परमेश्वर के वचन की सच्चाई से हटकर किसी अन्य बात/शिक्षा की ओर अग्रसर कर दे।
【26】 बड़ाई – परमेश्वर के कामों/भलाई के कारण उसको सराहना ( Psa. 34:1)
【27】 महिमा – परमेश्वर के स्वभाव के प्रगट होने से उत्पन्न प्रभाव।
【28】 व्यवस्था – परमेश्वर के मार्गों को सिखाने के लिए आज्ञाओं, नियमों और विधियों का संग्रह।
【29】 पवित्र होना – परमेश्वर द्वारा किसी को स्वयं के लिए अलग करना और उसमें स्वयं की  योजना/इच्छा/स्वभाव को शामिल करना/जोड़ना ( 1 Thess. 4:7,8)
【30】 ईश्वरीय संगति – परमेश्वर के साथ एक हो जाना/गूंथ जाना ( 1 Cori. 6:17)
【31】 कुड़कुड़ाना- किसी विपरीत परिस्थिति के कारण मन के व्याकुल हो जाने से उस परिस्थिति के प्रति दोषपूर्ण बातों/विचारों से भर जाना।  
【32】 अंगीकार – विश्वास की खुली घोषणा।
                   – किसी परिस्थिति के कारण मन में  उत्पन्न विचारों पर विश्वास करके उन्हें अपने मुंह से घोषित करना (Gen. 1:3; Pro. 18:21)
【33】 उद्धार – पापों की क्षमा
       – पूर्ण छुटकारा
【34】 सिद्धता- अपवित्रता से मुक्ति
           – मन का नया हो जाना।
【35】 उपासना – किसी को अपने जीवन में सर्वोच्च स्थान पर रख कर उसकी स्तुति करना।
     – परमेश्वर के सम्मुख स्वयं को समर्पित कर देना।
【36】 क्षमा – किसी के द्वारा किए गए पापों को मन से भूल जाना/मिटा देना (Mat. 18:35)
【37】 अभिलाषा – परमेश्वर की इच्छा/वचन के विरुद्ध उत्पन्न होने वाली इच्छा (James 1:14)
【38】 जलन – दूसरों को अपने से अधिक अच्छा/उत्तम आंकने पर उनके प्रति उत्पन्न नकारात्मक मनोभाव ( Gen. 4:5,6)
【39】 मनन – परमेश्वर के वचन/प्रतिज्ञा पर विश्वास करके उस पर अपने मन को केंद्रित किए रहना ( Joshua 1:8; Psa. 1:2)
【40】 प्रकाश – अंधकार को दूर करने वाली सामर्थ ( Gen. 1:3-5)
【41】 बपतिस्मा – शुद्ध विवेक से परमेश्वर के वश में हो जाना ( 1 Pt. 3:21)
【42】 घमण्ड – स्वयं को दूसरों से अधिक अच्छा समझना।
   – अपनी योग्यता से अधिक स्वयं को आंकना।
【43】 मंदिर – परमेश्वर की उपस्थिति का स्थान।
【44】 विनती – नम्रता के साथ परमेश्वर से बात/याचना करना।
【45】 धन्यवाद – परमेश्वर के किए कामों/भलाई के प्रति आभार प्रगट करना (1 Thess. 5:18)
【46】 आत्मिक स्वतंत्रता – पाप की असहनीय/अनैच्छिक/अरुचिकर अधीनता/दासता/बंधन से अलग/दूर होकर पवित्रात्मा की अधीनता/इच्छा में आ जाना (Gala.-5:1)
■ कलीसिया के लिए प्रयुक्त संकेत – * खलियान  (mat. 3:12)
* दाख की बारी- (mat. 20:1)
* भेड़शाला – (john 10:1 )
* झुण्ड (Luke 12:32)
* दुल्हन ( Rev. 22:17)
* मसीह की देह (1 Cori. 12:27;  Ephi. 4:12)
* पवित्र कुंवारी ( 2 Cori. 11:2)
【47】 आत्मिक सेविकाई – आत्मिक जगत और भौतिक जगत को मिलाने वाला बिंदु।
【48】 मरे हुए काम – प्रेम से रहित भले काम (Heb. 6:1)
【49】 वाचा – दो दलों के बीच का समझौता।
【50】 जागना – अपने पापों को स्मरण करके उनसे मन  फिराना (Rev. 2:5)

शैतान के लिए प्रयुक्त संकेत –
* पुराना सांप
* अजगर ( Rev. 12:3)
* दुष्ट (भजनसंहिता की पुस्तक में)
* बलियाल (2 Cori. 6:15)
* परखनेवाला (Mat. 4:3)
* भरमानेवाला
* हत्यारा (John 8:44)
* झूठ का पिता (John 8:44)
* अंधकार का हाकिम (Ephi. 6:12)
* बालजबूब (Mat. 12:24)
* संसार का ईश्वर (2 Cori. 4:4)
* चोर (John 10:10)
* गर्जन वाला सिंह (1 Pt. 5:8)
【51】 गवाही – परमेश्वर के वचन के अभ्यास (Practical) से उत्पन्न अनुभव ।
【52】 समर्पण – अपने सम्पूर्ण जीवन से परमेश्वर से प्रेम रखना और परमेश्वर को अपने जीवन में सर्वोपरि मानना ( Mat. 22:37)
【53】 आदर – स्वयं को छोटा करके परमेश्वर के वचन और इच्छा को बड़ा जानकर उनका अनुपालन करना।
【54】 क्रूस उठाना – अन्याय सहन करना ( Mat. 16:24; John 19:17)
【55】 खोई हुई भेड़ – वे लोग जो मसीह की सच्चाई से अनजान हैं/दूर हैं ( Luke 19:10)
【56】 भटकी हुई भेड़ – वे विश्वासी जो मसीह की सच्चाई को जानने के बावजूद मसीह से दूर हो गए हैं ( Luke chep. 15)
【57】 पुनरुत्थान – मरने के बाद पुनः जी उठना (Luke 24:6)
【58】 गुप्त आगमन – सच्चे विश्वासियों को अपने साथ अपने राज्य में ले जाने के लिए मध्य आकाश में यीशु मसीह की पिता की महिमा में आने की घटना (1 Thess. 4:16,17)
【59】 मसीह विरोधी – पवित्रात्मा के कामों का विरोध करने वाले लोग।
【60】 दोहाई – दुःख/कठिनाई/समस्या में टूटकर (रोकर) परमेश्वर को पुकारना (Exo. 2:23)
【61】 ईश्वरीय ज्ञान – सत्य के वचन को अपने जीवन में ठीक रीति से अभ्यास करने/काम में लाने से उत्पन्न/प्रदत्त ईश्वरीय अनुभव को। ( 2 Tim. 2:15; Jam. 3:17)
【62】 समझौता करना – परमेश्वर के वचन के विरुद्ध किसी बात/काम को मानने/करने के लिए सहमत हो जाना।
【63】 दृष्टांत – यूनानी भाषा में दृष्टान्त का मतलब है, एक चीज़ से दूसरे की तुलना।
【64】 सुरक्षा – मसीह में विश्वास रखने के परिणामस्वरूप परमेश्वर द्वारा दी जाने वाली स्वर्गीय सहायता।
【65】 नम्रता – स्वयं को छोटा करना (Luke 14:11)
            – दिनतापूर्ण अभिव्यक्ति (Colo. 4:6)
【66】 पवित्र आत्मा के लिए प्रयुक्त संकेत
● तेल
● कबूतर
【67】 प्रकाश- परमेश्वर की सच्चाई का प्रगटीकरण।


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