तुम पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ते* हो, क्योंकि समझते हो कि उसमें अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है, और यह वही है, जो मेरी गवाही देता है; फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते।
यूहन्ना 5:39-40
● प्रभु यीशु मसीह यहाँ पर लोगों से कहते हैं कि लोग अनंत जीवन पाने के लिए पवित्रशास्त्र में ढूढ़ते हैं पर पवित्रशास्त्र (बाइबल) परमेश्वर की गवाही देता है अर्थात वह परमेश्वर के बारे में बताता है यानि पवित्रशास्त्र परमेश्वर के बारे में ज्ञान प्रदान करता है।
और लोग इसी ज्ञान को अनंत जीवन समझ बैठते हैं।
● पर अनंत जीवन परमेश्वर पिता और प्रभु यीशु मसीह को जानना है (यूहन्ना 17:3)
● यहाँ पर दो तरह की बातें सामने आती है-
पहली, परमेश्वर के बारे में जानना
दूसरी, परमेश्वर को जानना
● जब कोई विश्वासी पवित्रशास्त्र (बाइबल) को पढ़ता या सुनता है, तो वह एक प्रकार के ज्ञान को प्राप्त करता है, जिससे वह परमेश्वर के बारे में जान पाता है, परन्तु जब वह उस ज्ञान के अनुसार परमेश्वर के पास जाता है, तो वह एक ईश्वरीय अनुभव को प्राप्त करता है, जिससे वह परमेश्वर को जान पाता है।
उदाहरण के लिए, आम मीठा होता है, यह आम के मीठा होने के बारे में ज्ञान है, किन्तु जब हम आम खाते हैं तो हम मीठा लगता है, यह आम के मीठे होने का अनुभव है।
जैसे कि- परमेश्वर प्रेम है, यह ज्ञान है किंतु जब उस प्रेम को हम महसूस करते हैं, यह एक ईश्वरीय अनुभव है।
● बाइबल बताती है कि शास्त्रियों और फरीसियों को मसीह के बिषय में हुई सारी पुराने नियम की बातें मालूम थी अर्थात वे मसीह के बारे कही गयी सारी बातें जानते थे किंतु जब वही मसीह उनके सामने आया तो उन्होंने उसे बालजबूब एवं शैतान कहकर धुतकार दिया।
● यानि यह बात सम्भव है कि आज विश्वासी पवित्रशास्त्र के तो ज्ञानी हो सकते हैं किंतु उस पवित्रशास्त्र में वर्णित परमेश्वर के बिषय में उनका ईश्वरीय अनुभव नगण्य हो सकता है।
● इसलिए प्रभु लोगों से कहता है कि तुम लोग पवित्रशास्त्र में मुझे खोजते हो पर मुझे जानने के लिए मेरे पास नहीं आते।
तुम लोग ज्ञान को ही परमेश्वर समझ बैठते हो।
● इसलिए प्रभु चाहता है कि हम लोग बाइबल से प्राप्त ज्ञान के अनुसार प्रभु के पास जाएं जिससे परमेश्वर स्वयं को एक ईश्वरीय अनुभव के रूप में हम पर प्रगट कर सकें।