Speaking in tongues

Speaking in tongues ## Pastor Chris

Sometime in 2001, I preached a message titled “Power For Change,” and in that teaching, I told the congregation never to be afraid. I told them, “You have more power inside you than everyone who’s of the world. So don’t be afraid of kidnappers. If you ever get kidnapped, don’t be afraid of them. Don’t beg. Don’t negotiate. Let them take you. Sit there with them and say, “Let’s go!”

“As they’re taking you away, speak in other tongues. Before long, they’ll be the ones begging you. By the time you’re speaking in those tongues, you’re actually saying, “I claim these ones for Jesus Christ!” They may tell you, “Shut up or else…!” but don’t respond in English. Reply them in other tongues. As you speak, your angels will take their positions and you will be victorious!”

Shortly after I preached this message, a young lady in our church who had heard it was kidnapped. She later testified that as her kidnappers were taking her away, she remembered this message and she just blew up speaking in tongues.

They threatened her several times to keep shut or they would kill her, but she said she couldn’t contain herself anymore. She spoke in tongues even louder, and as she did, she became bolder in spite of her desperate situation. The next thing she knew, the kidnappers stopped the car, opened the doors and fled. Glory to God!

मनन करना

मेरी आँखें खोल दे, कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूँ।
भजन संहिता 119:18
* आंखे चीजो को देखने का काम करती है, यदि हमारी आंखे बन्द हो तो हम चीजो को नहीं देख सकते।
* यहाँ पर परमेश्वर की व्यवस्था अर्थात वचन की अद्धभुत बातों को देखने के लिए आँखों को खोलने की बात कही गयी है।
  यहाँ पर यह नहीं कहा गया है कि व्यवस्था (वचन) को देखने के लिए बल्कि अद्धभुत बातों को देखने के लिए।
* जिस तरह से भौतिक संसार में तब तक किसी चीज को देख नहीं सकते जब तक कि हमारी शारीरिक आंखे खुली न हो, उसी तरह वचन की अद्धभुत बातों को देखने के लिए हमारी आँखों का खुलना आवश्यक है, पर कौन सी आँखों का?
क्या हमारी शारीरिक आंखें बन्द हैं, बिलकुल नहीं, बल्कि शारीरिक आँखे लिखी गयी व्यवस्था या वचन को देख पा रही है, पढ़ पा रही है, पर ये शारीरिक आँखे अद्धभुत बातों को नहीं देख पा रही है, क्योंकि यदि ये आंखे वचन की अद्धभुत बातों को देख पाती तो भजनकार आँखों के खुलने की बात न कहता, क्योंकि उसकी शारीरिक आंखे तो पहले से खुली हुई थी।
इसका मतलब वह वचन की अद्धभुत बातों को देखने के लिए एक दूसरी आंख के खुलने की बात कह रहा है और यह आंख आत्मिक आंख है।
* क्यों केवल आत्मिक आँखों के द्वारा ही हम वचन की अद्धभुत बातों को देख सकते हैं? क्योंकि वचन स्वयं आत्मा है (यूहन्ना 6:63) और आत्मिक चीजो को देखने अर्थात जानने और समझने के लिए आत्मा की आँखों का खुलना जरूरी है।
* अब सवाल यह उठता है कि व्यवस्था की अद्धभुत बाते है क्या? वचन के भीतर छिपे हुए रहस्य।
इसलिए भजनकार कह रहा है कि उसकी आत्मिक आँखे खुल जाए, ताकि वह वचन के भीतर छिपे हुए रहस्यों को जान और समझ सके।
* अब सवाल यह है कि वचन की अद्धभुत बातों को देखने के लिए हमारी आंखे खुले कैसे?
जब हम वचन पर मनन करते हैं तो हमारी आंखे खुलती जाती है।
आपको मालूम होगा कि परमेश्वर का वचन दीपक है (भजन संहिता 119:105) और दीपक में प्रकाश होता है, यानि वचन में प्रकाश है, और जब हम वचन पर मनन करते हैं तो हमारी आंखे खुल जाती है और यह प्रकाश हमारी खुली हुई आँखों पर चमकता है, जिससे हम उस वचन के भीतर छिपे हुए रहस्यों और भेदों को देख और जान और समझ पाते हैं।
उदाहरण के लिए, जब आप एक अँधेरे कमरे में जाते हैं, और वहाँ बल्ब जला देते हैं तो बल्ब का प्रकाश आपकी आँखों पर चमक जाता है और आप उस कमरे की सभी चीजों को देखने में सक्षम हो जाते हैं।
जरा सोचिए, जब एक व्यक्ति अँधेरे कमरे में जाएं और उसकी आंखें बंद (अँधा) हो  तो यदि वह कमरे का बल्ब जलाएगा भी तौभी उसे कमरे की कोई भी चीज दिखायी नहीं देगी।
और यदि उसकी आंखे खुली हो और वह कमरे में जाए और बल्व न जलाए तौभी उसे कमरे की चीजें दिखाई नहीं देगी।
इसी तरह जब आप वचन पर मनन नहीं करते तो वचन का प्रकाश आपकी आँखों पर नहीं पड़ेगा और अद्धभुत बातों को आप देख नहीं पाओगे।

परीक्षा का समय

चाहे मैं घोर अंधकार से भरी हुई तराई में होकर चलूँ, तौभी हानि से न डरूँगा, क्योंकि तू मेरे साथ रहता है; तेरे सोंटे और तेरी लाठी से मुझे शान्ति मिलती है।
    भजन संहिता 23:4
● बाइबल बताती है कि परमेश्वर हमको अंधकार की तराई अर्थात कठिनाइयों/मुसीबतों/दुखों का बीच से होकर ले जाता है, किन्तु उन कठिनाइयों में वह हमारे साथ रहता है।
● कई बार विश्वासी अपनी कठिन परिस्थितियों में सोचते हैं कि यदि परमेश्वर हमारे साथ है तो हम इन कठिनाइयों में क्यों फंसे हैं और वे परमेश्वर की उपस्थिति पर सन्देह करने लगते हैं।
● क्योंकि ये कठिन परिस्थितियां ऐसा समय है, जब व्यक्ति को कुछ सूझता नहीं है और परमेश्वर भी इन परिस्थित्तियों में चुप्पी बनाए रखता है ताकि वह उस व्यक्ति के मन के विचारों और उसके अंगीकार को जान सके और परमेश्वर इन परिस्थित्तियों में देखता है कि क्या वह व्यक्ति परमेश्वर के साथ चलेगा या नहीं।
● बाइबल बताती है कि युसूफ जब झूठे आरोप के कारण जेल में था, तो वहाँ भी परमेश्वर यहोवा उसके साथ था।
जबकि युसूफ अपनी कठिन परिस्थितियों से गुजर रहा था।
● किसी व्यक्ति के जीवन में कठिन समय/परिस्थित्तियों का आने का मतलब यह नहीं है कि परमेश्वर ने उस व्यक्ति को छोड़ दिया, बल्कि इसका मतलब यह है कि परमेश्वर इन कठिन परिस्थितियों के जरिये यह जाँच (check) कर रहा है कि वह व्यक्ति परमेश्वर के साथ खड़ा रहेगा या परमेश्वर से पीछे हट जायेगा।
● क्योंकि यदि वह व्यक्ति परमेश्वर के साथ खड़ा रहेगा तो एक नए स्तर (level) को प्राप्त करेगा, जिस स्तर में कुछ नई आशीषे उसके जीवन में आएंगी।
● बाइबल बताती है कि जब युसूफ जेल में भी परमेश्वर के साथ खड़ा रहा, तो परमेश्वर ने उसे उस देश का प्रधानमंत्री बनाया।
● अपनी आत्मिक परीक्षाओं (Tests) में सही रीति से प्रदर्शन (Performance) करने पर ही एक सही आत्मिक परिणाम (Result) आता है।

बाइबल से सम्बंधित शब्द

  

  

【1】 आत्मिक जन – आत्मा से जन्मा हुआ (John 3:8)
【2】आनंद- स्थायी रूप  से रहने वाली प्रसन्नता
【3】 शांति – हर परिस्थिति में मन में स्थिरता रहना
【4】 धीरज- परीक्षा/परख के समय में विश्वास को लंबे समय तक थामे रखने का गुण
【5】 कृपा – किसी की दीनहीन दशा के प्रति तरस का भाव आना
【6】 विश्वास- आशा की निश्चिचता 
– अनदेखे को मानो देखना
– एक नींव/ गुण जो हमें किसी भी नष्ट होने की संभावना और किसी भी तरह की परेशानी का सामना करने और सहने योग्य बनाता है। 
【7】 सच्चाई – परमेश्वर को पहचानना ( John 1:14,18)
【8】 परमेश्वर का भय- प्रेम के साथ परमेश्वर के वचन को मानना ( Gen. 22:12; John 14:15)
【9】 क्रोध – हमारी मन की इच्छा के अनुसार किसी काम के संपन्न न होने पर उत्पन्न मनोभाव ( Gen. 4:6; Ephi. 4:26)
【10】 अल्पविश्वास – किसी परिस्थिति के कारण मन में परमेश्वर के वचन के प्रति सन्देह होना ( Mat. 14:30,31)
【11】 सन्देह- किसी विपरीत परिस्थिति के कारण मन का अशांत/अस्थिर दशा में आ जाना ( Mat. 21:21; Dan. 5:16)
【12】 अविश्वास – किसी परिस्थति के कारण परमेश्वर के वचन के प्रति मन में उत्पन्न सन्देह पर पूर्ण भरोसा कर लेना ( Mark 6:1-6)
【13】 प्रार्थना – परमेश्वर के सम्मुख मन की बातों को मुंह पर लाना ( Psa. 62:8)
【14】 मूर्तिपूजा – परमेश्वर के स्थान पर किसी अन्य चीज को ले आना ( Exo. 20:3,4)
【15】 नया जन्म – परमेश्वर के वचन के अनुसार पवित्रात्मा के द्वारा शरीरक दशा से आत्मिक दशा में आना ( John 3:6; 1 Peter 1:23)
【16】 न्याय – कामों का प्रतिफल पाना (Rom. 2:6)
【17】 धार्मिकता – परमेश्वर के अनुरूप जीवन (Gen. 6:9)
   – परमेश्वर के साथ सही रूप से चलना/खड़े रहना।
【18】 कलीसिया – संसार से अलग किए गए लोग (John 15:19)
【19】 पाप – परमेश्वर की बात न मानना
【20】 दीनता – परमेश्वर के सम्मुख टूटा हुआ मन ( Psa. 51:17)
    – परमेश्वर की उपस्थिति में स्वयं को शून्य समझना/मानना
【21】 विवेक – सही और गलत की समझ
【22】 जीवन – परमेश्वर का स्वभाव
【23】 अनंत जीवन – पिता और पुत्र को जानना ( John 17:3)
【24】 मनफिराव – मन के स्वभाव में बदलाव की इच्छा
【25】 झूठी शिक्षा – वह शिक्षा/विचारधारा/मत जो परमेश्वर या परमेश्वर के वचन की सच्चाई से हटकर किसी अन्य बात/शिक्षा की ओर अग्रसर कर दे।
【26】 बड़ाई – परमेश्वर के कामों/भलाई के कारण उसको सराहना ( Psa. 34:1)
【27】 महिमा – परमेश्वर के स्वभाव के प्रगट होने से उत्पन्न प्रभाव।
【28】 व्यवस्था – परमेश्वर के मार्गों को सिखाने के लिए आज्ञाओं, नियमों और विधियों का संग्रह।
【29】 पवित्र होना – परमेश्वर द्वारा किसी को स्वयं के लिए अलग करना और उसमें स्वयं की  योजना/इच्छा/स्वभाव को शामिल करना/जोड़ना ( 1 Thess. 4:7,8)
【30】 ईश्वरीय संगति – परमेश्वर के साथ एक हो जाना/गूंथ जाना ( 1 Cori. 6:17)
【31】 कुड़कुड़ाना- किसी विपरीत परिस्थिति के कारण मन के व्याकुल हो जाने से उस परिस्थिति के प्रति दोषपूर्ण बातों/विचारों से भर जाना।  
【32】 अंगीकार – विश्वास की खुली घोषणा।
                   – किसी परिस्थिति के कारण मन में  उत्पन्न विचारों पर विश्वास करके उन्हें अपने मुंह से घोषित करना (Gen. 1:3; Pro. 18:21)
【33】 उद्धार – पापों की क्षमा
       – पूर्ण छुटकारा
【34】 सिद्धता- अपवित्रता से मुक्ति
           – मन का नया हो जाना।
【35】 उपासना – किसी को अपने जीवन में सर्वोच्च स्थान पर रख कर उसकी स्तुति करना।
     – परमेश्वर के सम्मुख स्वयं को समर्पित कर देना।
【36】 क्षमा – किसी के द्वारा किए गए पापों को मन से भूल जाना/मिटा देना (Mat. 18:35)
【37】 अभिलाषा – परमेश्वर की इच्छा/वचन के विरुद्ध उत्पन्न होने वाली इच्छा (James 1:14)
【38】 जलन – दूसरों को अपने से अधिक अच्छा/उत्तम आंकने पर उनके प्रति उत्पन्न नकारात्मक मनोभाव ( Gen. 4:5,6)
【39】 मनन – परमेश्वर के वचन/प्रतिज्ञा पर विश्वास करके उस पर अपने मन को केंद्रित किए रहना ( Joshua 1:8; Psa. 1:2)
【40】 प्रकाश – अंधकार को दूर करने वाली सामर्थ ( Gen. 1:3-5)
【41】 बपतिस्मा – शुद्ध विवेक से परमेश्वर के वश में हो जाना ( 1 Pt. 3:21)
【42】 घमण्ड – स्वयं को दूसरों से अधिक अच्छा समझना।
   – अपनी योग्यता से अधिक स्वयं को आंकना।
【43】 मंदिर – परमेश्वर की उपस्थिति का स्थान।
【44】 विनती – नम्रता के साथ परमेश्वर से बात/याचना करना।
【45】 धन्यवाद – परमेश्वर के किए कामों/भलाई के प्रति आभार प्रगट करना (1 Thess. 5:18)
【46】 आत्मिक स्वतंत्रता – पाप की असहनीय/अनैच्छिक/अरुचिकर अधीनता/दासता/बंधन से अलग/दूर होकर पवित्रात्मा की अधीनता/इच्छा में आ जाना (Gala.-5:1)
■ कलीसिया के लिए प्रयुक्त संकेत – * खलियान  (mat. 3:12)
* दाख की बारी- (mat. 20:1)
* भेड़शाला – (john 10:1 )
* झुण्ड (Luke 12:32)
* दुल्हन ( Rev. 22:17)
* मसीह की देह (1 Cori. 12:27;  Ephi. 4:12)
* पवित्र कुंवारी ( 2 Cori. 11:2)
【47】 आत्मिक सेविकाई – आत्मिक जगत और भौतिक जगत को मिलाने वाला बिंदु।
【48】 मरे हुए काम – प्रेम से रहित भले काम (Heb. 6:1)
【49】 वाचा – दो दलों के बीच का समझौता।
【50】 जागना – अपने पापों को स्मरण करके उनसे मन  फिराना (Rev. 2:5)

शैतान के लिए प्रयुक्त संकेत –
* पुराना सांप
* अजगर ( Rev. 12:3)
* दुष्ट (भजनसंहिता की पुस्तक में)
* बलियाल (2 Cori. 6:15)
* परखनेवाला (Mat. 4:3)
* भरमानेवाला
* हत्यारा (John 8:44)
* झूठ का पिता (John 8:44)
* अंधकार का हाकिम (Ephi. 6:12)
* बालजबूब (Mat. 12:24)
* संसार का ईश्वर (2 Cori. 4:4)
* चोर (John 10:10)
* गर्जन वाला सिंह (1 Pt. 5:8)
【51】 गवाही – परमेश्वर के वचन के अभ्यास (Practical) से उत्पन्न अनुभव ।
【52】 समर्पण – अपने सम्पूर्ण जीवन से परमेश्वर से प्रेम रखना और परमेश्वर को अपने जीवन में सर्वोपरि मानना ( Mat. 22:37)
【53】 आदर – स्वयं को छोटा करके परमेश्वर के वचन और इच्छा को बड़ा जानकर उनका अनुपालन करना।
【54】 क्रूस उठाना – अन्याय सहन करना ( Mat. 16:24; John 19:17)
【55】 खोई हुई भेड़ – वे लोग जो मसीह की सच्चाई से अनजान हैं/दूर हैं ( Luke 19:10)
【56】 भटकी हुई भेड़ – वे विश्वासी जो मसीह की सच्चाई को जानने के बावजूद मसीह से दूर हो गए हैं ( Luke chep. 15)
【57】 पुनरुत्थान – मरने के बाद पुनः जी उठना (Luke 24:6)
【58】 गुप्त आगमन – सच्चे विश्वासियों को अपने साथ अपने राज्य में ले जाने के लिए मध्य आकाश में यीशु मसीह की पिता की महिमा में आने की घटना (1 Thess. 4:16,17)
【59】 मसीह विरोधी – पवित्रात्मा के कामों का विरोध करने वाले लोग।
【60】 दोहाई – दुःख/कठिनाई/समस्या में टूटकर (रोकर) परमेश्वर को पुकारना (Exo. 2:23)
【61】 ईश्वरीय ज्ञान – सत्य के वचन को अपने जीवन में ठीक रीति से अभ्यास करने/काम में लाने से उत्पन्न/प्रदत्त ईश्वरीय अनुभव को। ( 2 Tim. 2:15; Jam. 3:17)
【62】 समझौता करना – परमेश्वर के वचन के विरुद्ध किसी बात/काम को मानने/करने के लिए सहमत हो जाना।
【63】 दृष्टांत – यूनानी भाषा में दृष्टान्त का मतलब है, एक चीज़ से दूसरे की तुलना।
【64】 सुरक्षा – मसीह में विश्वास रखने के परिणामस्वरूप परमेश्वर द्वारा दी जाने वाली स्वर्गीय सहायता।
【65】 नम्रता – स्वयं को छोटा करना (Luke 14:11)
            – दिनतापूर्ण अभिव्यक्ति (Colo. 4:6)
【66】 पवित्र आत्मा के लिए प्रयुक्त संकेत
● तेल
● कबूतर
【67】 प्रकाश- परमेश्वर की सच्चाई का प्रगटीकरण।


परमेश्वर एक ईश्वरीय अनुभव है

तुम पवित्रशास्त्र में ढूँढ़ते* हो, क्योंकि समझते हो कि उसमें अनन्त जीवन तुम्हें मिलता है, और यह वही है, जो मेरी गवाही देता है; फिर भी तुम जीवन पाने के लिये मेरे पास आना नहीं चाहते।
   यूहन्ना 5:39-40
● प्रभु यीशु मसीह यहाँ पर लोगों से कहते हैं कि लोग अनंत जीवन पाने के लिए पवित्रशास्त्र में ढूढ़ते हैं पर  पवित्रशास्त्र (बाइबल) परमेश्वर की गवाही देता है अर्थात वह परमेश्वर के बारे में बताता है यानि पवित्रशास्त्र परमेश्वर के बारे में ज्ञान प्रदान करता है।
और लोग इसी ज्ञान को अनंत जीवन समझ बैठते हैं।
● पर  अनंत जीवन परमेश्वर पिता और प्रभु यीशु मसीह को जानना है (यूहन्ना 17:3)
● यहाँ पर दो तरह की बातें सामने आती है-
पहली, परमेश्वर के बारे में जानना
दूसरी, परमेश्वर को जानना
● जब कोई विश्वासी पवित्रशास्त्र (बाइबल) को पढ़ता या सुनता है, तो वह एक प्रकार के ज्ञान को प्राप्त करता है, जिससे वह परमेश्वर के बारे में जान पाता है, परन्तु जब वह उस ज्ञान के अनुसार परमेश्वर के पास जाता है, तो वह एक ईश्वरीय अनुभव को प्राप्त करता है, जिससे वह परमेश्वर को जान पाता है।
  उदाहरण के लिए, आम मीठा होता है, यह आम के मीठा होने  के बारे में ज्ञान है, किन्तु जब हम आम खाते हैं तो हम मीठा लगता है, यह आम के मीठे होने का अनुभव है।
जैसे कि- परमेश्वर प्रेम है, यह ज्ञान है किंतु जब उस प्रेम को हम महसूस करते हैं, यह एक ईश्वरीय अनुभव है।
● बाइबल बताती है कि शास्त्रियों और फरीसियों को मसीह के बिषय में हुई सारी पुराने नियम की बातें मालूम थी अर्थात वे मसीह के बारे कही गयी सारी बातें जानते थे किंतु जब वही मसीह उनके सामने आया तो उन्होंने उसे बालजबूब एवं शैतान कहकर धुतकार दिया।
● यानि यह बात सम्भव है कि आज विश्वासी पवित्रशास्त्र के तो ज्ञानी हो सकते हैं किंतु उस पवित्रशास्त्र में वर्णित परमेश्वर के बिषय में उनका ईश्वरीय अनुभव नगण्य हो सकता है।
● इसलिए प्रभु लोगों से कहता है कि तुम लोग पवित्रशास्त्र में मुझे खोजते हो पर मुझे जानने के लिए मेरे पास नहीं आते।
तुम लोग ज्ञान को ही परमेश्वर समझ बैठते हो।
● इसलिए प्रभु चाहता है कि हम लोग बाइबल से प्राप्त ज्ञान के अनुसार प्रभु के पास जाएं जिससे परमेश्वर स्वयं को एक ईश्वरीय अनुभव के रूप में हम पर प्रगट कर सकें।

चुनाव करना

तब लूत ने आँख उठाकर, यरदन नदी के पास वाली सारी तराई को देखा कि वह सब सिंची हुई है। जब तक यहोवा ने सदोम और अमोरा को नाश न किया था, तब तक सोअर के मार्ग तक वह तराई यहोवा की वाटिका, और मिस्र देश के समान उपजाऊ थी। सो लूत अपने लिये यरदन की सारी तराई को चुन के पूर्व की ओर चला, और वे एक दूसरे से अलग हो गये।
उत्पत्ति 13:10-11
● बाइबल बताती है कि जब अब्राहम और उसके भतीजे लूत के चरवाहों के मध्य झगड़ा हुआ तो इसके निपटारे के लिए अब्राहम ने लूत से अलग हो जाने की बात कही और उसने लूत के सामने चुनाव रखा और लूत ने एक हरी तराई चुन ली, जो सदोम के निकट थी, जो एक दुष्ट नगर था।
● चुनाव एक प्रकार का निर्णय है, जिसका प्रभाव आने वाले समय पर दिखाई देता है।
● लूत ने हरी तराई को तो चुना किन्तु इस चुनाव का प्रभाव भविष्य में दिखाई पड़ा।
● लूत का चुनाव परमेश्वर के अनुसार नहीं वल्कि उसकी शारीरिक आँखों की इच्छा के अनुसार थी, जिसका परिणाम यह निकला कि एक दुष्ट नगर में चला गया, जिसे परमेश्वर ने नाश किया, लूत की पत्नी नमक का खम्भा बन गयी, उसकी बेटियों ने उसे नशे में धुत करके उसके द्वारा जातियों को पैदा किया, जिनसे परमेश्वर घृणा करता था।
    लूत के एक गलत चुनाव ने उसके पूरे वंश को प्रभावित किया।
● इसके विपरीत अब्राहम ने एक बंजर भूमि को चुना , जिसमे परमेश्वर की इच्छा शामिल थी और परमेश्वर ने उसे आशीषित किया और वह भूमि सदा के लिए उसके वंश को दे दी।
● जब कोई व्यक्ति अपनी शारीरिक अभिलाषा से प्रेरित होकर किसी गलत वस्तु आदि का चुनाव करता है, तो वह उसके साथ जुडे गलत परिणाम का चुनाव कर लेता है।
जिस प्रकार से लूत ने अपनी शारीरिक आँखों से प्रेरित होकर तराई को चुना पर साथ में उसने उससे जुड़े दुखद परिणाम को  भी चुना।
●  हमारा आज का चुनाव हमारे आने वाले भविष्य को प्रभावित कर सकता है, इसलिए यह जानना जरूरी है कि जो हम आज चुन रहे हैं क्या उसमें परमेश्वर की इच्छा शामिल है कि नहीं?
◆ एक सवाल में आप सभी से पूछना चाहता हूं कि क्या कारण था कि अब्राहम ने लूत के समान उस हरी तराई को नहीं चुना?

Introduce Yourself (Example Post)

This is an example post, originally published as part of Blogging University. Enroll in one of our ten programs, and start your blog right.

You’re going to publish a post today. Don’t worry about how your blog looks. Don’t worry if you haven’t given it a name yet, or you’re feeling overwhelmed. Just click the “New Post” button, and tell us why you’re here.

Why do this?

  • Because it gives new readers context. What are you about? Why should they read your blog?
  • Because it will help you focus your own ideas about your blog and what you’d like to do with it.

The post can be short or long, a personal intro to your life or a bloggy mission statement, a manifesto for the future or a simple outline of your the types of things you hope to publish.

To help you get started, here are a few questions:

  • Why are you blogging publicly, rather than keeping a personal journal?
  • What topics do you think you’ll write about?
  • Who would you love to connect with via your blog?
  • If you blog successfully throughout the next year, what would you hope to have accomplished?

You’re not locked into any of this; one of the wonderful things about blogs is how they constantly evolve as we learn, grow, and interact with one another — but it’s good to know where and why you started, and articulating your goals may just give you a few other post ideas.

Can’t think how to get started? Just write the first thing that pops into your head. Anne Lamott, author of a book on writing we love, says that you need to give yourself permission to write a “crappy first draft”. Anne makes a great point — just start writing, and worry about editing it later.

When you’re ready to publish, give your post three to five tags that describe your blog’s focus — writing, photography, fiction, parenting, food, cars, movies, sports, whatever. These tags will help others who care about your topics find you in the Reader. Make sure one of the tags is “zerotohero,” so other new bloggers can find you, too.

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